Tuesday, 11 June 2019

आस का आलिंगन

लिखूँ कुछ ऐसा कि ऋचाएँ वेद की हो जाएं

हृदय की वेदना गुनगुनाऊँ
       करूँ जब प्रेम का चिंतन |
सूखी धरा से हो आलिंगन
       फिज़ाएँ मेघ की हो जाएँ

अथक प्रयास मेरा है
         अनंत उपहास है जग का
 पथ में शूल बोये हैं
         कहाँ आशीष है सब का !
   
है वेग की स्थिरता,
       कठिन त्वरण का होना है ।
पथ चयन ही ऐसा है
      थकना है न सोना है

अब कुरुक्षेत्र नया सा है
    है साहस का नव विवरण
निज अस्थियाँ गलाउं
    नव अस्त्र का हो सृजन

गढ़ूं मैं व्याकरण ऐसा
       हो जिसमें बस प्रेम की उपमा
मन जब लेखनी पकड़े
      सजग हो क्रांति का सपना

सींचूँ जब क्यारियों को मैं
      अंकुरित हो स्नेह के कोंपल
उर्वरक प्रेम का डालूँ
      जल श्रम का हो अविरल

निरंतर आरोहण में
        सकल प्रयास मेरा है
अस्तित्व रहे ना रहे किन्तु
      सिद्धि ध्येय की हो जाएं

लिखूँ कुछ ऐसा कि ऋचाएँ वेद की हो जाएं
~हिमांशु

The mind of men and women

An article by Himanshu Kumar  04/20/2023 It is a wonderful present that a man may give to a woman when he is able to listen to her feelings ...