लिखूँ कुछ ऐसा कि ऋचाएँ वेद की हो जाएं
हृदय की वेदना गुनगुनाऊँ
करूँ जब प्रेम का चिंतन |
सूखी धरा से हो आलिंगन
फिज़ाएँ मेघ की हो जाएँ
अथक प्रयास मेरा है
अनंत उपहास है जग का
पथ में शूल बोये हैं
कहाँ आशीष है सब का !
है वेग की स्थिरता,
कठिन त्वरण का होना है ।
पथ चयन ही ऐसा है
थकना है न सोना है
अब कुरुक्षेत्र नया सा है
है साहस का नव विवरण
निज अस्थियाँ गलाउं
नव अस्त्र का हो सृजन
गढ़ूं मैं व्याकरण ऐसा
हो जिसमें बस प्रेम की उपमा
मन जब लेखनी पकड़े
सजग हो क्रांति का सपना
सींचूँ जब क्यारियों को मैं
अंकुरित हो स्नेह के कोंपल
उर्वरक प्रेम का डालूँ
जल श्रम का हो अविरल
निरंतर आरोहण में
सकल प्रयास मेरा है
अस्तित्व रहे ना रहे किन्तु
सिद्धि ध्येय की हो जाएं
लिखूँ कुछ ऐसा कि ऋचाएँ वेद की हो जाएं
~हिमांशु
हृदय की वेदना गुनगुनाऊँ
करूँ जब प्रेम का चिंतन |
सूखी धरा से हो आलिंगन
फिज़ाएँ मेघ की हो जाएँ
अथक प्रयास मेरा है
अनंत उपहास है जग का
पथ में शूल बोये हैं
कहाँ आशीष है सब का !
है वेग की स्थिरता,
कठिन त्वरण का होना है ।
पथ चयन ही ऐसा है
थकना है न सोना है
अब कुरुक्षेत्र नया सा है
है साहस का नव विवरण
निज अस्थियाँ गलाउं
नव अस्त्र का हो सृजन
गढ़ूं मैं व्याकरण ऐसा
हो जिसमें बस प्रेम की उपमा
मन जब लेखनी पकड़े
सजग हो क्रांति का सपना
सींचूँ जब क्यारियों को मैं
अंकुरित हो स्नेह के कोंपल
उर्वरक प्रेम का डालूँ
जल श्रम का हो अविरल
निरंतर आरोहण में
सकल प्रयास मेरा है
अस्तित्व रहे ना रहे किन्तु
सिद्धि ध्येय की हो जाएं
लिखूँ कुछ ऐसा कि ऋचाएँ वेद की हो जाएं
~हिमांशु
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