जब दामिनी का बलात्कार हुआ, वर्षों से जमा आक्रोश का जनसैलाब उमड़ पड़ा। Threshold (बांध) टूट गया था ।
तब मिडिया को थौक भाव में मसाला मिला।
बाढ़ अक्सर बंज़र भूमि को उपजाऊ बना जाता है।
न्यूज़ चैनलों पर News Producers & vendors की कलाकारी देखते बनती थी। किसी चैनल पर कोई नाक से न्यूज़ सुनाने वाला शायरी सुना रहा था तो कहीं कोई न्यूज़ वेंडर "क्या हुआ उस रात" टाइप न्यूज़ को मसाला मार के तेल में तल रहा था और गरमा गरम Garnished न्यूज़ परोस रहा था ! (एनिमेसन की चटनी के साथ)....
किसी दूसरे चैनल पर कोई बॉलीवुड का गवैय्या दर्द भरे नगमें गाकर 'देश की बेटी' को श्रधांजलि अर्पित कर रहा था।
उधर संसद में तो भावविह्वल नेताओं (खासकर महिला मोर्चा) की अश्रु-सरिता तो रोके नही रुक रही थी। एक बार तो लगा की दिल्ली का जल-संकट दूर हो जायेगा।
ये बात और है कि उनके अपने पार्टियों में बलात्कारी भरे पड़े हैं। लेकिन उनके गणमान्य बलाकारियों ने तो "दामिनी" का बलात्कार नहीं किया था ना, तो वो कैसे दोषी हो गये भई ? और नौटंकीवुड में वर्षों का अनुभव संसद में काम नही आएगा तो और कहाँ आएगा ?
लेकिन दामिनी के आक्रोशित भाई-बहनों में इतनी ऊर्जा थी की दमनकारी सरकार एवं कानून-निर्माताओं की कुर्सियों के नीचे आग लगा गयी ।
फलस्वरूप संसद में तत्काल एक दामिनी-रक्षक क़ानून पास किया गया। ये बात और थी कि उस कानून के निर्माण के समय संसद के लगभग आधे नेता गायब थे।
शायद दामिनी के शोक में व्यथित होकर घर पर विलाप कर रहे होंगे।
बहरहाल मैं देश की महान मिडिया की बात कर रहा था
दामिनी/ज्योति चली गयी देश में ज्योति जला कर ...देश को आन्दोलित कर.. ..देश को एक नया कानून देकर....और न्यूज़ चैनलों को TRP की सौगात देकर।
लेकिन दामिनी के बाद भी देश में बलात्कार रुके नही,
कानून की किताब में नया कानून भी है, फिर भी ।
दिल्ली में सरकार बदली, जागरूक जनता ने एक आन्दोलनकारी सरकार को मौका दिया। आम आदमी की सरकार आई जिसके बस में दिल्ली की प्रख्यात पुलिस नही है। अरे भई संविधान है....क्या करे ?...
दिल्ली में फिर एक दामिनी जिंदा जला दी गयी । लेकिन इस दामिनी की चीख में इतना दम नही था कि मीडिया की कान तक पहुँच सके और Primetime में उसकी 'चर्चा' हो सके । दहेज़ में दामिनी तो रोज़ जलती है, इसमें क्या नया है? 'उस' दामिनी में क्या नया था कि उसकी चीख ओबामा तक पहुँच गयी ?
लेकिन आम आदमी की संवेदनशील सरकार तक इस दामिनी की हल्की चीख पहुँच गयी। सरकार ने पुलिस वालों की ज़िम्मेदारी तय करनी चाही। लेकिन अज़ब दिल्ली की गज़ब सरकार को संविधान ने इतनी शक्ति भी नही दी है कि पुलिस की जड़ता को तोड़ने के लिए नालायक SHO/हवलदारों को सस्पेंड तक कर सके।
तब आम आदमी के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केंद्र से गुहार लगायी। पर ना केंद्र ने सुनी ...ना नरेन्द्र ने !! सरकार को अपनी जायज़ बात मनवाने के लिए एवं कुख्यात दिल्ली पुलिस को जनहित का सबक सिखाने के लिए केंद्र के विरुद्ध दिल्ली की कड़कड़ाती ठण्ड में धरना देना पड़ा।
वर्दीधारी गुंडों की गुंडागर्दी से पीड़ित जनता ने अरविन्द का साथ दिया और पुलिस की लाठियाँ खायी ! ध्यान रहे कि दिल्ली पुलिस के कर्मठ ज़वान ऐसे माध्यम से प्रायः अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन करते रहते हैं । आधी रात में नाईट शिफ्ट वाले टीवी पत्रकार भी आते रहे ... टीवी देखने वाली जनता को दिखाया कि देखिये अराज़क अरविन्द कैसे आराम से सो रहे हैं ।
आंदोलनकारी मुख्यमंत्री ने ठण्डी रात अपनी कैबिनेट के साथ दिल्ली की सड़कों पर सोकर काटी...
किसके लिए ?????
विपक्ष ने सरकारी बंगले से रजाई में दुबक कर मिडिया को एक मिनी-बाइट दे दिया....कहा -"अरविन्द केजरीवाल अराज़कता फैला रहे हैं" ।
सुबह हुई । मीडिया वालों ने अरविन्द से फिर पूछा -"आप मुख्यमंत्री होकर धरना क्यों कर रहे हैं, कहीं ये सब ड्रामा लोकसभा की सीट जीतने का प्लान तो नही ?"
अरविन्द ने फिर कहा कि ये सब वो अपनी दिल्ली/देश की माँ-बहनों की सुरक्षा के लिए कर रहे हैं।
फिर अरविन्द ने उस दामिनी का जिक्र किया जो जिंदा जला दी गयी और पुलिस ने अपना काम नही किया।
पूछने वाली पत्रकार भी महिला ही थी जो original दामिनी के समय टीवी पर बहुत व्यथित दिख रही थी ...लेकिन इस बार की दामिनी में वो बात कहाँ जो उसकी कहानी 20 मिनट भी (12 मिनट ad के साथ) न्यूज़ चैनल पर दिखा सके । जली हुई सब्जी कौन खाता है ? ऊपर से मसाला भी नहीं है .. :(
समर शेष है,
आक्रोशित भारत
(@himQuantum on twitter)
very well said. agree of your all though. i also respect Mr. Arvind Kejrival and have no doubt to say he is a great person who have good mentality to change our politician culture, but i think there should be appropriate way to do these all work.
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